महज़ कांटे ही महफ़ूज़ हैं इस ज़माने में,
फूल तो मसल जाते हैं राहों को सजाने में !
कभी अपनों की शिकायत ग़ैरों से कीजिये,
कोई पीछे न रहेगा आग लगाने में !
इतना महँगा भी नहीं है तसल्ली देना,
इतना ख़र्चा भी नहीं है मुस्कुराने में !
कोई अपना रूठ जाए तो उसे मना लेना,
एक उम्र लगती है रिश्तों को बनाने में !
नफ़रत अगर चाहिए तो मुफ़्त मिलेगी,
मगर प्यार ख़र्च होता है प्यार कमाने में !
इक़रार न सही तो इंकार ही सही,
कुछ तो हासिल होगा दिल आज़माने में !
तुझे याद तो महज़ इसलिए करता
हूँ,
मुझे आराम मिलता है दिल जलाने में !
तेरी हसरत तो करता हूँ, ज़िद नहीं करता,
कोई बुराई तो नहीं तुझे इस तरह चाहने में !
गुनाह तो तब है कि जब मयकशी की जाये,
कोई गुनाह नहीं 'फ़राज़' मयकदे जाने में !
||| फ़राज़ |||
महज़ = Merely, Only
महफ़ूज़ = Safe
ज़माना = World, Era
शिकायत = Complaint, Lamentation
ग़ैर = Stranger, Rival, Outsider
तसल्ली = Solace, Consolation, Comfort
ख़र्चा = Expense
नफ़रत = Hate
इक़रार = Consent, Pledge
इंकार = Denial, Refusal
हासिल = Gain, Result
आज़माना = Try, Test
हसरत = Desire
ज़िद = Insistence
गुनाह = Sin, Crime, Fault
मयकशी = Boozing, To Drink
मयकदे= Bar, Tavern