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रविवार, 3 दिसंबर 2017

फ़ासले !!!

जान का क्या ग़म, एक ही बार तो जानी है,
ये सोच के ज़िन्दगी को रोज़ आज़माया हमने !

दिल ही आशना था तूफ़ान की मौजों से,
घर इसलिए ही साहिल पर था बनाया हमने !

आज फ़िर नमाज़ में तेरा ख़याल आया है,
आज फ़िर गुनाह-ए-शरियत दोहराया हमने !

क्या ख़बर थी की वो ख़ुदा पत्थर का है,
अपना मज़हब था जिसको बनाया हमने !

रिश्तों को निभाने की आदतें थी हमें,
कुछ ग़लतियों को भी आदतन निभाया हमने !

कौन होता है हमसफ़र गर्दिश के सितारे का,
परख कर देख लिया हर अपना पराया मैंने !

देख आज वो फ़िर आसरा मांगने आया है,
दिल की मिट्टी से घर जिसका बनाया हमने !

ये क्या लिख दिया फ़राज़ की बेवफ़ा है वो,
ये राज़ अब तलक सबसे था छुपाया हमने !

बताना था ज़माने को रुख़ हवाओं का,
ख़त के पुर्ज़ों को फ़ज़ा में उड़ाया हमने !

फ़ासले फ़िर वो नए देकर चला गया,
दूरियां मिटाने था जिसको बुलाया हमने !

|||फ़राज़|||

ग़म= Sorrow, Grief.
आशना= Intimate, Acquaintance.
मौज= Wave
साहिल= Beach, Coast.
गुनाह-ए-शरियत= A sin or crime according to Islamic law.
मज़हब= Religion
आदतन= Habitually
गर्दिश= Misfortune, Rotation, Circulation
आसरा= Shelter.
बेवफ़ा= Infidel.
ज़माना= The world, The era.
रुख़= Direction.
पुर्ज़े= Shreds, Pieces.
फ़ज़ा= Ambience.
फ़ासले= Distances, Spaces