मंगलवार, 17 जनवरी 2017

तस्कीन



      बरसों तलक खोलता रहा दर्द की परतें,
आज तेरी बातों को मैं मरहम कर लूँ !
बन के आया है तू घने से सावन जैसा,
क्यों न आज रूह को मैं अपनी तर लूँ !

ये तन्हा आग़ोश मेरे दिल में चुभता है,
टूट जाना अगर मैं बाँहों में भर लूँ !
कभी मेरी दीवानगी का तक़ाज़ा भी समझ,
तू मुझमें समाता है मैं सांस अगर लूँ !

एक तस्कीन है वाबस्ता तेरे नाम के साथ,
दिल मेरा बहल जाता है मैं नाम अगर लूँ !
मुसाफ़िर मेरी राहों का आ गया है वापस,
क्यों न ज़िन्दगी को भी हमसफ़र कर लूँ !

फ़राज़...

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