कैसी अकड़ तुझको तेरे जिस्म-ए-फ़ानी पर,
अकड़ तो लाश जाती है, तू अकड़ता क्यूँ है !
ख़ुदा से भी डरता नहीं ये दिल तेरा,
तो मौत से दिल भला डरता क्यूँ है !
ख़ुद को बताता है तू अह्ल-ए-सुन्नत,
पंख परिंदों के भला तू कतरता क्यूँ है !
तुझको मालूम है न आयगा वो अयादत करने,
आह भरता है तू तो आह तू भरता
क्यूँ है !
कहते हैं कि प्यार है ताउम्र का
नशा
है अगर ये नशा तो फ़िर उतरता क्यूँ है !
सबको तो मालूम है पता
तेरे नए घर का
डाकिया अब भी मेरी गली से गुज़रता क्यूँ है !
तेरे दामन से लिपटे हैं मेरे लम्हें अब भी
वक़्त मुट्ठी से रेत सा फिसलता क्यूँ है !
तू तो कहता की अब तुझे फर्क़ नहीं पड़ता
देख कर मुझको अब तू संभालता क्यूँ है !
मेरे तसव्वुर में झाँक कर देखो तो जानोगे
दिल मेरा उसको पाने को मचलता क्यूँ है !
लौट आएगा फ़िर से तेरा
गुज़रा हुआ कल,
जागती आँखों में ये ख़्वाब टहलता क्यूँ है !
ऐ फ़राज़ तू अब बच्चा तो
नहीं है,
हसरतें चाँद को छूने की करता क्यूँ है !
|||फ़राज़|||
जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal Body.
परिंदा= Birds
अयादत= visiting, inquiring (after ailing person)
ताउम्र= Life long
दामन= Hem,
फ़र्क= Difference.
तसव्वुर= Imagination, Contemplation.
अह्ल-ए-सुन्नत= When Islam
was being broken into sects on small differences, a majority of the believers
who stayed close to the guidance and teachings of the Messenger of Allah
(saws), came to be recognized as the Ahle-Sunnah wal Jamaa. Their main principle was to stay close to the
teachings of the Quran and Sunnah, and stay within the Jamaa or Ummah of
Muslims without joining any of the breakaway sects. Thus their name: Ahle-Sunnah wal
Jamaa (those who follow the Sunnah and stay with the Jamaa or community).