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मंगलवार, 30 जुलाई 2019

हम-नज़र

हर पहर चाहिएता-उमर चाहिए,
मुझको तेरी वफ़ाउम्र-भर चाहिए !

देखे जब आईनाउसको मैं ही दिखूँ,
मुझको मुझसा कोई हम-नज़र चाहिए !

मेरी ज़िद है उसे सिर्फ़ मैं ही तकूँ,
मुझको घूँघट में मेरा क़मर चाहिए !

साथ मेरे चले मेरी परछाईं सा,
मुझको मेरी तरह हम-सफ़र चाहिए !

साथ तेरे ही शामें ढलें उम्र-भर,
साथ तेरे शबों की सहर चाहिए !

ज़ुल्म करना है तो मुझपे जी भर के कर,
तुझसे कुछ भी कहाँ मुख़्तसर चाहिए !

एक मुद्दत से प्यासा मैं 'अल्फ़ाज़हूँ,
अबकी सावन कोई तर-ब-तर चाहिए !

||| अल्फ़ाज़ |||

पहर = Period Of Time, An 8th Hour Of A Day
ता-उमर = Life Long, आजीवन
वफ़ा = Love/Fulfillment, Fidelity, प्रेमईमानदारीनिष्ठा
हम-नज़र = People Who've Same Vision/Point Of View, समद्रष्टा
क़मर = The Moon, चंद्रमाचाँद
हमसफ़र = Fellow-Traveler, सहयात्री
शब = Night, रात
सहर = Morning, प्रभातसुबह
ज़ुल्म = Oppression, Injustice, उत्पीड़नअत्याचार
मुख़्तसर = Brief, संक्षिप्त
मुद्दत = A Length Of Time, Duration, बहुत समय

तर-ब-तर = Completely Drenched

रविवार, 16 सितंबर 2018

काँटों की तरह

हम ख़ुद से क्यूँ बे-ज़ार हैं काँटों की तरह,
हम ख़ुद में ही हथियार हैं काँटों की तरह !

उस गुल से वफ़ा का तक़ाज़ा नहीं करते,
हम जिसके पहरेदार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह डर नहीं मुरझाने का हमें,
हम तो सदाबहार हैं काँटों की तरह !

शाख़ों से कोई हमको जुदा कर नहीं सकता,
ता-उम्र वफ़ादार हैं काँटों की तरह !

रंग-ओ-बू से गुल की हमको कोई नहीं ग़रज़,
हम बे-सरोकार हैं काँटों की तरह !

गुलशन की रिवायत से शिकायत नहीं हमें,
मुक़द्दर के हम शिकार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह बिकते नहीं हम बाज़ार में,
-ज़िद-ओ-बा-वक़ार हैं काँटों की तरह !

चुभते हैं तो चुभेंगे ता-ज़िन्दगी तुम्हें,
हम साहिब-ए-किरदार हैं काँटों की तरह !

कीमत मेरे हुनर कीन दे सका ज़माना,
‘फ़राज़’ बे-ख़रीदार हैं काँटों की तरह !
           
||| फ़राज़ |||

बेज़ार= To Be Sick Of
हथियार= Weapon, Arms
गुल= Flower
वफ़ा= Fidelity, Faithfulness
तक़ाज़ा= Demand, Urge
पहरेदार= Watchman,  Guard
शाख़= Branch, Bough,
ता-उम्र= Lifelong
वफ़ादारFaithful, Loyal
सदाबहार= Evergreen
रंग-ओ-बूColor And Fragrance
ग़रज़Intention, Object
बे-सरोकार = Unconcerned
गुलशन= Flower Garden
रिवायत= Tradition, Custom
शिकायत= Complaint
मुक़द्दर= Destiny
शिकार= Victim
बाज़ार= Market
बज़िद= Persistent, Obstinate
बा-वक़ार= Honored, Prestigious, Reputed
ता-ज़िन्दगी= Lifelong
साहिब-ए-किरदार= Man Of Character
ज़माना= The World, Era, Time
बे-ख़रीदार= Without Customer

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

हसरतें !!!

कैसी अकड़ तुझको तेरे जिस्म-ए-फ़ानी पर,
अकड़ तो लाश जाती है, तू अकड़ता क्यूँ है !

ख़ुदा से भी डरता नहीं ये दिल तेरा,
तो मौत से दिल भला डरता क्यूँ है !

ख़ुद को बताता है तू अह्ल-ए-सुन्नत,
पंख परिंदों के भला तू कतरता क्यूँ है !

तुझको मालूम है न आयगा वो अयादत करने,
आह भरता है तू तो आह तू भरता क्यूँ है !

कहते हैं कि प्यार है ताउम्र का नशा
है अगर ये नशा तो फ़िर उतरता क्यूँ है !

सबको तो मालूम है पता तेरे नए घर का
डाकिया अब भी मेरी गली से गुज़रता क्यूँ है !

तेरे दामन से लिपटे हैं मेरे लम्हें अब भी
वक़्त मुट्ठी से रेत सा फिसलता क्यूँ है !

तू तो कहता की अब तुझे फर्क़ नहीं पड़ता
देख कर मुझको अब तू संभालता क्यूँ है !

मेरे तसव्वुर में झाँक कर देखो तो जानोगे
दिल मेरा उसको पाने को मचलता क्यूँ है !

लौट आएगा फ़िर से तेरा गुज़रा हुआ कल,
जागती आँखों में ये ख़्वाब टहलता क्यूँ है !

ऐ फ़राज़ तू अब बच्चा तो नहीं है,
हसरतें चाँद को छूने की करता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||

जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal Body.
परिंदा= Birds
अयादत= visiting, inquiring (after ailing person)
ताउम्र= Life long
दामन= Hem,
फ़र्क= Difference.
तसव्वुर= Imagination, Contemplation.
अह्ल-ए-सुन्नत= When Islam was being broken into sects on small differences, a majority of the believers who stayed close to the guidance and teachings of the Messenger of Allah (saws), came to be recognized as the Ahle-Sunnah wal Jamaa. Their main principle was to stay close to the teachings of the Quran and Sunnah, and stay within the Jamaa or Ummah of Muslims without joining any of the breakaway sects. Thus their name: Ahle-Sunnah wal Jamaa (those who follow the Sunnah and stay with the Jamaa or community).