pahredar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
pahredar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 सितंबर 2018

काँटों की तरह

हम ख़ुद से क्यूँ बे-ज़ार हैं काँटों की तरह,
हम ख़ुद में ही हथियार हैं काँटों की तरह !

उस गुल से वफ़ा का तक़ाज़ा नहीं करते,
हम जिसके पहरेदार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह डर नहीं मुरझाने का हमें,
हम तो सदाबहार हैं काँटों की तरह !

शाख़ों से कोई हमको जुदा कर नहीं सकता,
ता-उम्र वफ़ादार हैं काँटों की तरह !

रंग-ओ-बू से गुल की हमको कोई नहीं ग़रज़,
हम बे-सरोकार हैं काँटों की तरह !

गुलशन की रिवायत से शिकायत नहीं हमें,
मुक़द्दर के हम शिकार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह बिकते नहीं हम बाज़ार में,
-ज़िद-ओ-बा-वक़ार हैं काँटों की तरह !

चुभते हैं तो चुभेंगे ता-ज़िन्दगी तुम्हें,
हम साहिब-ए-किरदार हैं काँटों की तरह !

कीमत मेरे हुनर कीन दे सका ज़माना,
‘फ़राज़’ बे-ख़रीदार हैं काँटों की तरह !
           
||| फ़राज़ |||

बेज़ार= To Be Sick Of
हथियार= Weapon, Arms
गुल= Flower
वफ़ा= Fidelity, Faithfulness
तक़ाज़ा= Demand, Urge
पहरेदार= Watchman,  Guard
शाख़= Branch, Bough,
ता-उम्र= Lifelong
वफ़ादारFaithful, Loyal
सदाबहार= Evergreen
रंग-ओ-बूColor And Fragrance
ग़रज़Intention, Object
बे-सरोकार = Unconcerned
गुलशन= Flower Garden
रिवायत= Tradition, Custom
शिकायत= Complaint
मुक़द्दर= Destiny
शिकार= Victim
बाज़ार= Market
बज़िद= Persistent, Obstinate
बा-वक़ार= Honored, Prestigious, Reputed
ता-ज़िन्दगी= Lifelong
साहिब-ए-किरदार= Man Of Character
ज़माना= The World, Era, Time
बे-ख़रीदार= Without Customer

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

वतन के जाँ-निसार

कोई मज़हब नहीं होता शहीदों की मज़ारों का,
कोई मज़हब नहीं होता वतन के जाँ-निसारों का,

मज़हब को पूछकर गोली सरहद पे नहीं चलती,
कोई मज़हब नहीं होता सरहद के पहरेदारों का !

||| फ़राज़ |||

मज़हब= Religion
शहीद= Martyr
मज़ार= Shrine, Tomb
वतन= Country, Abode
जाँ-निसार= Devoted, Fervent, One Who Sacrifices His Life For Others.
सरहद= Border
पहरेदार= Sentinel, Watchman.

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

इश्क़ का चर्चा !!!

हमको भी न ख़बर थी कि हमें प्यार हो गया,
फ़िर सारे ज़माने में कैसे इश्तिहार हो गया !

हर कोई पढ़ने लगा मुझको ख़बर की तरह,
तेरी आशिक़ी में आख़िर मैं अख़बार हो गया !

जो आये न थे कभी मेरी मिजाज़पुर्सी को,
उनको भी मेरी हंसी से सरोकार हो गया !

हर कोई पढ़ने लगा मुझको ख़बर की तरह,
तेरी आशिक़ी में आख़िर मैं अख़बार हो गया !

सर-ए-बाज़ार हर नज़र तेरा ही सवाल करती है,
इश्क़ का चर्चा मेरे शहर का कारोबार हो गया !

मुख़बिर तो उस गली में पहले भी थे 'फ़राज़',
उस राह का हर पत्थर अब पहरेदार हो गया !

|||फ़राज़|||

इश्तिहार= Advertisement, Notification.
मिजाज़पुर्सी= Asking for Wellbeing.
सरोकार= Concern, Relation.
सर-ए-बाज़ार= Openly, In public.
मुख़बिर= Spy, Informer, Reporter.