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मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

बे-फ़िक्रियां

पक्की सी यारियोँ  की कच्ची सी डोरियों में,
सच्ची सी क़ुर्बतें हैंझूठी सी दूरियों में !

बेहतर तो बचपना थारिश्तों में ज़ाईक़ा था,
मीठी सी यारियाँ थींखट्टी सी बेरियों में !

कल रात ख़ुद-ब-ख़ुद हम थोड़े सुलझ गए थे,
कल रात हम थे उलझे तेरी पहेलियों में !

उस पल में जैसे गर्दिश आलम की रुक गई थी,
थामा था उसका चेहरामैंने हथेलियों में !

गर हाथ की लकीरों में वो नहीं है तो फ़िर,
रेखाएँ बे-वजह हैं मेरी हथेलियों में !

तेरी भी क़िस्सा-गोई है मेरी महफ़िलों में,
मेरा भी ज़िक्र बाक़ीतेरी सहेलियों में !

मुफ़्लिस हम इस क़दर हैंलुटने से बे-ख़बर हैं
ये लज़्ज़तें कहाँ हैं ऊँची हवेलियों में !

ग़ुरबत के बर्तनों में तुम झाँक कर के देखो,
एक भूख है उबलतीख़ाली पतीलियों में !

हो इतना ही मयस्सरखोने का जिसको न डर,
बे-फ़िक्रियां कहाँ हैं, ‘अल्फ़ाज़’ अमीरियों में !

||| अल्फ़ाज़ |||

क़ुर्बत= Nearness, Vicinity
ज़ाईक़ा= Flavor, Sense Of Taste, Savor
ख़ुद-ब-ख़ुद= All By Oneself, Automatically
गर्दिश= Revolution, Circulation, 
आलम= The Universe, World
गर= If
क़िस्सा-गोई= Story-Telling
महफ़िल= Gathering, Party, Congregation,
ज़िक्र= Narration/ Remembrance/ Talk
मुफ़्लिस= Poor, Indigent, Bankrupt
बे-ख़बर= Ignorant, Uninformed
लज़्ज़त= Taste, Flavor
ग़ुरबत= Poverty
मयस्सर= Available
बे-फ़िक्री= Carefree, Contentedness, Unconcern

रविवार, 21 मई 2017

हक़ीकत !!!

क्या हक़ीकत है जिस्म की रूह के बग़ैर,
किसी मय्यत को कन्धा कभी लगाकर देखो !
 
पैबंद लगा सही मगर दुपट्टा सर पर रहता है,
अदब, मुफ़्लिस मकानों में कभी जाकर देखो !
 
कुछ तो हुनर ख़ुदा ने तुझको भी दिया होगा,
सोच के जाले कभी ज़हन से हटाकर देखो !
 
तेरे सारे गुनाह एक पल में धुल जायेंगे,
किसी प्यासे को कभी पानी पिलाकर देखो !
 
शायद कोई शिक़ायत है तक़दीर से तुम्हें,
दर्दमंदों को कभी गले से लगाकर देखो !
 
लौटकर आ जायेंगे अगर तेरे अपने होंगे,
रूठे हुओं को कभी दिल से बुला कर देखो !


||| फ़राज़ |||

पैबंद= Patchwork
मुफ़्लिस=Poor, Indigent.

बुधवार, 10 मई 2017

दिल-ए-मुफ़्लिस !!!


क्यूँ न दर्द को ही अब हमसफ़र कर लें
एक दर्द ही तो है जो छोड़ कर जाता नहीं !

तेरी पर्देदारियों का एहतराम रखता है
इल्ज़ाम दिल तुझपर कभी लगाता नहीं !

रखता है मुनव्वर सदा तेरी यादों से
शमा-ए-उम्मीद दिल कभी बुझाता नहीं !

एक हम कि हर बार ही तेरी ज़िद करते हैं
एक तू कि ग़लतियां कभी दोहराता नहीं !

यूँ तो नज़रों से है फ़ासला अब सदियों का
ख़ुदाया दिल से आखिर वो क्यूँ जाता नहीं !

क्या ख़बर थी की वो करता है दिल्लगी
वादे हज़ार करता है मगर निभाता नहीं !

तेरी राहों के हवाले ही अब कर दूँ  ज़िन्दगी
बराह-ए-रास्त दूजा अब और नज़र आता नहीं !

दिल-ए-मुफ़्लिस तू अब न रूठा कर
मुद्दतें गुजरीं कि अब वो मनाता नहीं !

||| फ़राज़ |||

पर्देदारियां= Secrecies.
इल्ज़ाम= Blame
मुनव्वर= Illuminated.
शमा-ए-उम्मीद= Candle of hope.
ज़िद= Insistence.
सदियां= Ages, Centuries.
ख़ुदाया= God.
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
बराह-ए-रास्त= Directing, Guiding.
दिल-ए-मुफ़्लिस= Poor Heart. 
मुद्दत= A long time/period