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रविवार, 21 मई 2017

हक़ीकत !!!

क्या हक़ीकत है जिस्म की रूह के बग़ैर,
किसी मय्यत को कन्धा कभी लगाकर देखो !
 
पैबंद लगा सही मगर दुपट्टा सर पर रहता है,
अदब, मुफ़्लिस मकानों में कभी जाकर देखो !
 
कुछ तो हुनर ख़ुदा ने तुझको भी दिया होगा,
सोच के जाले कभी ज़हन से हटाकर देखो !
 
तेरे सारे गुनाह एक पल में धुल जायेंगे,
किसी प्यासे को कभी पानी पिलाकर देखो !
 
शायद कोई शिक़ायत है तक़दीर से तुम्हें,
दर्दमंदों को कभी गले से लगाकर देखो !
 
लौटकर आ जायेंगे अगर तेरे अपने होंगे,
रूठे हुओं को कभी दिल से बुला कर देखो !


||| फ़राज़ |||

पैबंद= Patchwork
मुफ़्लिस=Poor, Indigent.

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

जब आप बुलाया करते थे !

जब शाम ढले तारे तकते,
एक सोच में डूबे रहते थे !
उसके फ़ितूर में अलसाये,
हम रात से सुबह करते थे !

जब नाम को तेरे दोहराते,
एक नींद से बैर लिया हमने !
और जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब सजाया करते थे !

एक उम्र में लाखों लम्हें हैं,
जब आप पुकारा करते था !
हर सरहद तब थी बेमानी,
जब आप बुलाया करते थे !

एक वक़्त भी ऐसा आया था,
जब हमसे उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल की मन्नत थी !

जब छुप के दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़ पर आता था !
हम मुंडेरों के पीछे से ,
हर शाम नज़ारा करते थे !

तब जलने में भी ठंडक थी,
जब आप सताया करते थे !
बेवजह अक्सर रूठे हम,
      जब आप मनाया करते थे !