जब शाम ढले
तारे तकते,
एक सोच में
डूबे रहते थे
!
उसके फ़ितूर
में अलसाये,
हम रात से
सुबह करते थे
!
जब नाम को तेरे
दोहराते,
एक नींद से
बैर लिया हमने
!
और
जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब
सजाया करते थे
!
एक उम्र में
लाखों लम्हें हैं,
जब आप
पुकारा करते था !
हर सरहद तब
थी बेमानी,
जब आप
बुलाया करते थे !
एक वक़्त भी
ऐसा आया था,
जब हमसे
उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे
मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल
की मन्नत थी !
जब छुप के
दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़
पर आता था !
हम मुंडेरों
के पीछे से ,
हर शाम
नज़ारा करते थे !
तब जलने में
भी ठंडक थी,
जब आप सताया
करते थे !
बेवजह अक्सर
रूठे हम,
जब आप मनाया करते थे !