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सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

तिश्नगी

साहिल पे ला के हमको यूँ तिश्ना न कीजिये,
ढलती है रात अब तो पर्दा न कीजिये !

तिश्नगी दीदार की बढ़ जाएगीसुनिए,
चेहरा हथेलियों में छुपाया न कीजिये !

ऐसी भी क्या नज़र के मैं ईमान से जाऊँ,
यूँ मद-भरी निगाह से देखा न कीजिये !

जीते जी आप हमको मारा न कीजिये,
बिखरी हुई ये ज़ुल्फ़ संवारा न कीजिये !

है क्या ख़बर कि सच में मेरी जाँ चली जाये,
झूठी कसम यूँ जान की खाया न कीजिये !

किसको ख़बर कि कौन सा लम्हा है आख़िरी,
छोटी सी ज़िन्दगी हैरूठा ना कीजिये !

किस किस से बैर लेंकिस किस से हम लड़ें,
यूँ बे-नक़ाब हो के निकला न कीजिये !

रुक रुक के जाँ निकलती है अल्फ़ाज़ की जानाँ,
हंस हंस के यूँ ग़ैरों से तो बोला न कीजिये !

||| अल्फ़ाज़ |||

तिश्नगी= Thirst, Longing
दीदार= Appearance, Sight, Seeing
ईमान= Belief, Conscience, Creed, Faith
मद-भरी= Full Of Intoxication, Ecstasy, Wantonness, Lust
ज़ुल्फ़= A Curling Lock (Of Hair)Hanging Over The Temple Or Ear, Tresses
जाँ= Life, Soul
बैर= Enmity, Hostility
बे-नक़ाब= Unveiled
जानाँ=  A Loved One, A Sweetheart, Dear
ग़ैर= Stranger, Outsider

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

जब आप बुलाया करते थे !

जब शाम ढले तारे तकते,
एक सोच में डूबे रहते थे !
उसके फ़ितूर में अलसाये,
हम रात से सुबह करते थे !

जब नाम को तेरे दोहराते,
एक नींद से बैर लिया हमने !
और जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब सजाया करते थे !

एक उम्र में लाखों लम्हें हैं,
जब आप पुकारा करते था !
हर सरहद तब थी बेमानी,
जब आप बुलाया करते थे !

एक वक़्त भी ऐसा आया था,
जब हमसे उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल की मन्नत थी !

जब छुप के दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़ पर आता था !
हम मुंडेरों के पीछे से ,
हर शाम नज़ारा करते थे !

तब जलने में भी ठंडक थी,
जब आप सताया करते थे !
बेवजह अक्सर रूठे हम,
      जब आप मनाया करते थे !