पक्की
सी यारियोँ की कच्ची
सी डोरियों में,
सच्ची
सी क़ुर्बतें हैं, झूठी सी दूरियों में !
बेहतर
तो बचपना था, रिश्तों में ज़ाईक़ा था,
मीठी
सी यारियाँ थीं, खट्टी सी बेरियों में
!
कल
रात ख़ुद-ब-ख़ुद हम थोड़े सुलझ गए थे,
कल
रात हम थे उलझे तेरी पहेलियों में !
उस
पल में जैसे गर्दिश आलम की रुक गई थी,
थामा
था उसका चेहरा, मैंने हथेलियों में !
गर हाथ की लकीरों में वो नहीं है तो फ़िर,
रेखाएँ बे-वजह हैं मेरी हथेलियों में !
तेरी
भी क़िस्सा-गोई है मेरी महफ़िलों में,
मेरा
भी ज़िक्र बाक़ी, तेरी सहेलियों में !
मुफ़्लिस हम इस क़दर हैं, लुटने से बे-ख़बर हैं
ये लज़्ज़तें कहाँ हैं ऊँची हवेलियों में !
ग़ुरबत के बर्तनों में तुम झाँक कर के देखो,
एक
भूख है उबलती, ख़ाली पतीलियों में !
हो
इतना ही मयस्सर, खोने का जिसको न डर,
||| अल्फ़ाज़ |||
क़ुर्बत= Nearness, Vicinity
ज़ाईक़ा= Flavor, Sense Of Taste, Savor
ख़ुद-ब-ख़ुद= All By Oneself, Automatically
गर्दिश= Revolution, Circulation,
आलम= The Universe, World
गर= If
क़िस्सा-गोई= Story-Telling
महफ़िल= Gathering, Party, Congregation,
ज़िक्र= Narration/
Remembrance/ Talk
मुफ़्लिस= Poor, Indigent, Bankrupt
बे-ख़बर= Ignorant, Uninformed
लज़्ज़त= Taste,
Flavor
ग़ुरबत= Poverty
मयस्सर= Available
बे-फ़िक्री= Carefree, Contentedness, Unconcern
बे-फ़िक्री= Carefree, Contentedness, Unconcern