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मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी

ख़्वाह-मख़ाह के डर में गुज़री,
ज़िन्दगी अगर-मगर में गुज़री !

तेरे इश्क़ में सारी जवानी,
एक गर्मी की दोपहर में गुज़री !

जैसे गाँव से रेलगाड़ी गुज़रे,
ज़िन्दगी ऐसे शहर में गुज़री !

रात को रो लिए अंधेरों में,
मत पूछिये क्या सहर में गुज़री !

गुनाहगारी में बाँकपन गुज़रा,
पीरी तो दर-गुज़र में गुज़री !

पल भर को सोचिये तो लगता है,
जैसे ज़िन्दगी पल भर में गुज़री !

पाँव फैले नहीं मगर ढके भी नहीं,
ज़िन्दगी छोटी सी चादर में गुज़री !

मेरे हाल से बे-ख़बर है 'अल्फ़ाज़',
ज़िन्दगी जिसकी फ़िकर में गुज़री !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़्वाह-मख़ाह = Just Like That, यूँ हीऐसे ही
अगर-मगर = If-But
सहर = Morning, प्रभातसुबह
गुनाहगारी = Sinning, पाप
बाँकपन = Teenage, Adolescence, लड़कपन
पीरी = Old Age, बुढ़ापा
दर-गुज़र = Pardon, Forgiveness, क्षमा करना
बे-ख़बर = Ignorant, Uninformed, अन्जान
फ़िकर = Concern, Thought, चिंता

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

!!! पीरी !!!

नहीं रहता है जिस्मों पर सदा मौसम जवानी का,
मगर दिल पर तो पीरी का कभी मौसम नहीं आता !!!

||| फ़राज़ |||


सदा = Forever
पीरी = old age, infirmity, exhaustion, weakness

सोमवार, 10 जुलाई 2017

इश्क़ !!!

क्या ख़ूब कह गया था
वो कहने वाला,
इश्क़ है आग का दरिया
फ़िर भी उतर के देख !

इस आग में जल के ही
तुझे मुनव्वर होना है,
गर यही बाक़ी है रास्ता
तो फ़िर गुज़र के देख !

कुछ अंगड़ाइयों को
तेरा भी इंतज़ार है,
दिल पर ले के वार
तू तीर-ए-नज़र के देख !

तेरी नज़रों को मियां
सारा ज़माना पढ़ता है,
तू ईद का चाँद भी
न उसकी मुंडेर पर से देख !

लोग तो लोग हैं
कानों में बातें करते हैं,
दीदार-ए-यार हो जाये
तो तू जी भर के देख !

न रहेंगी सदा जवानियाँ
कुछ ग़लतियाँ तो कर ले,
सबकी नज़रों से बच के
उसकी गली से गुज़र के देख !

तू छोड़ दे फ़िक्रें
सवाब और अज़ाबों की,
हसीन सा गुनाह है इश्क़
फ़िर भी कर के देख !

 ||| फ़राज़ |||

मुनव्वर= Illuminated, Enlightened
सवाब= Reward of good deeds
अज़ाब= Torment, Agony