जिस्मों की तो आदत है, मिल करके बिछड़ जाना,
तुम मिलना तो ऐसे मिलना कि रूह में उतर जाना !
मुड़कर के हमने देखा, जब अपनी ज़िन्दगी को,
उम्र-ए-दराज़ बस एक लम्हे का गुज़र जाना !
बेफ़िक्र किस क़दर था वो इश्क़ का ज़माना,
कर के तेरा तसव्वुर आठों पहर जाना !
मुझसे तेरी नज़र का पहले-पहल वो मिलना,
सदियों की गर्दिशों का लम्हें में ठहर जाना !
वो जाते-जाते तेरा मुड़कर के मुस्कुराना,
एक रूठती सी किस्मत का फ़िर से संवर जाना !
सब झूठ तो नहीं है, एक बात वो भी सच थी,
ज़िक्र-ए-फ़िराक़ से तेरी आँखों का वो भर जाना !
देखा जो परिंदों को, तो याद आया हमको,
वो शामों का ढलना, वो लौट के घर जाना !
इस बार तो इतना भी तक़दीर में नहीं है,
हो ईद का बहाना और अपने शहर जाना !
||| फ़राज़ |||
जिस्म= Body, Material, Substance
रूह= Soul, Spirit, The Vital Principle
उम्र-ए-दराज़= Long Life
लम्हा= Moment
बेफ़िक्र= Carefree
क़दर= Amount, Appreciation,
ज़माना= Era
तसव्वुर= Imagination, Thought
पहर= Period Of Time, An 8th Hour Of A Day.
पहले-पहल= Initially, The First Time.
सदियों= Centuries, Centenaries
गर्दिशों= Revolution, Circulation, Misfortune
ज़िक्र-ए-फ़िराक़= Mention/Talk of parting
परिंदों= Birds
तक़दीर= Fate, Destiny.