अपनी ही तलाश में निकला हूँ सफ़र को,
मौला तराश दे तू मेरे हुनर को !
एक फ़लसफ़ा यूँ लिखूं की बन जाये दास्ताँ,
कारीगरी सिखा दे तू नाक़ाम बशर को !
उन लम्हों को गुज़रे सदियाँ गुज़र गयीं,
वो तेरा छत पे आना भरी दोपहर को !
शायद गुज़रे वो शाम को फ़िर मेरी गली से,
हर रोज़ हूँ सजाता सितारों से मैं घर को !
वो चाँद बन के आता है शामों को फ़लक़ पे,
हर रात है गुज़री, तकते तेरे सफ़र को !
ले इम्तेहान तू मेरा पर मांगता हूँ ये,
मौला ज़रा बढ़ा दे तू मेरे सब्र को !
माना के ये अमावास बरसों से चल रही है,
एक तारा ही है काफ़ी निकलूं जब मैं सफ़र को !
तेरी रज़ा से मुमकिन हर काम हो गए,
हूँ मांगता दुआ में तुझसे उस नज़र को !
फ़राज़...