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बुधवार, 26 जून 2019

क़रार


जो कहा नहींजो सुना नहीं,
जो किसी ग़ज़ल में बयाँ नहीं !

वो जो हममें तुममें क़रार था,
हालात के आगे टिका नहीं !

पिंजरा तो उसने खोल दिया,
उड़ सकता था मैं उड़ा नहीं !

शायद उसको जाना ही था,
आवाज़ दी पर वो रुका नहीं !

शीशा गल के जुड़ सकता है,
दिल टूटा तो फ़िर जुड़ा नहीं !

ता'वीज़ दो उसको इश्क़ हुआ,
आसेब की कोई दवा नहीं !

तूफ़ान से तो बच सकता था,
मैं दरख़्त था झुक सका नहीं !

फ़िर लौट मेरी चिट्ठी आई,
वो घर अब उसका पता नहीं !

'अल्फ़ाज़कई हमराह मिले,
पर इश्क़ दोबारा मिला नहीं !

||| अल्फ़ाज़ |||

बयाँ = Statement, Assertion, वर्णनकहना
क़रार = Agreement, Bond, अनुबंधसमझौता
ता'वीज़ = Amulet, Talisman, जंतर
आसेब = Evil Spirit, Demon, भूत-प्रेतप्रेत-बाधा
दरख़्त = Tree, पेड़वृक्ष
हमराह = Fellow-Traveler, सहयात्री

सोमवार, 4 सितंबर 2017

इश्क-ए-कामिल!

एक रूह क़ैद है मेरे जिस्म की पिंजरे में,
ऐ ख़ुदा ये क्या अज़ीयत मुझपे नाज़िल है !
मेरी नाकामियां पढ़कर मुझे कहता क़ाबिल है,
हमने तो सुना था कि ज़माना बहुत फ़ाज़िल हैं !

ऐ मुश्किलों तुमसे हर बार जीत जाता हूँ,
मेरी निगाह में हरदम मेरी मंज़िल है !
तू भी आज अपने लहू की तासीर बता,
मेरी रगों में तो मेरे अल्फाज़ शामिल हैं !

बेक़रारियाँ, रतजगे, हूक सी दिल में है,
तेरी उम्मीद में इतना तो हमें हासिल है !
बारहा मेरे होश-ओ-हवास से भी तो तू जाता रहा,
फ़िर क्यूँ तेरे ख़्वाब से मेरी पलकें बोझिल हैं !

मेरे जनाज़े पर वो मेरा ही पता पूछता है,
बहुत ही मासूम सा वो मेरा क़ातिल है !
मेरे ज़िक्र पर अब भी वो चौंक सा जाता है,
नाक़ाम ही सही 'फ़राज़', इश्क तेरा कामिल है !

|||फ़राज़|||


नाज़िल= Descend.
फ़ाज़िल= Intelligent, wise, Expert.
तासीर=Effect, Influence, Impression.
होश-ओ-हवास= All Conciousness and Sense.
कामिल= Perfect.

शनिवार, 2 सितंबर 2017

रिहाई बेज़ुबान की !!!

मैं नहीं जानता दास्ताँ 
पिंजरे में क़ैद उस परिंदे की
मगर दिल है बाख़बर
उस बेज़ुबान के दर्द से !

एक काग़ज़ के टुकड़े के बदले
एक परिंदे को आज़ाद कर देना !

रिहाई बेज़ुबान की
इबादत है ख़ुदा की !!!

|||फ़राज़|||

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

लोग !

क़ैद करते हैं परिंदों को पिंजरों में
आज़ादी-ए-वतन पर इतराते हैं लोग !

करते हैं फ़साद इबादतगाहों की ख़ातिर
इबादत में वक़्त कम ही बिताते हैं लोग !

अक्सर देते हैं हवाले मसरूफ़ियात के
अब लोगों के काम कहाँ आते हैं लोग !

करते हैं इश्तेहार लोगों की ख़ताओं का
अपने गिरेबां में झाँक कहाँ पाते है लोग !

सब कहाँ पाते हैं यहाँ आसमान नया
रास्ते औरों के ही अक्सर दोहराते हैं लोग !

करते हैं वक़ालत लोग इश्क़दारी की
भूल पाने का हुनर कहाँ बताते हैं लोग !

हर जिंदा बशर में ऐब ढूंढ लेने वाले
मय्यतों पर यहाँ सोज़ मनाते हैं लोग !

||| फ़राज़ |||