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सोमवार, 26 नवंबर 2018

क़ीमत

क्यूँ कहता है महंगाई है,
अब भी सस्ती अच्छाई है !

अब भी सस्ता है मुस्काना,
अब भी सस्ती तो भलाई है !

हो अह्ल-ए-नज़र, तुम क्या जानो
कितनी महँगी बीनाई है !

दुनिया की दौलत न माने,
कितनी महंगी सच्चाई है !

महसूस करो इसको छू कर,
अब भी सस्ती पुरवाई है !

सौ नाज़ उठा के हासिल है
कितनी महंगी अंगड़ाई है!

जिस भीड़ में न कोई अपना,
उससे बेहतर तन्हाई है !

हर रोज़ हूँ बिकता सस्ते हैं
कितनी महँगी ये कमाई है !

क़ानून की क़ीमत है सस्ती
महँगी 'अल्फ़ाज़' रिहाई है !

||| अल्फ़ाज़ |||

अह्ल-ए-नज़र= People Of Vision
बीनाई= Vision, Eye-Sight
नाज़= Pride, Grace, Tantrum
हासिल= Gain
बेहतर= Better

क़ानून= Law, Ordinance, Rule

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

क़द-ओ-क़ामत !!!

अपनी हस्ती पे ग़ुरूर महज़ इतना सा है,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर आती है !

जब भी लौटता हूँ घर मैं नमाज़ पढ़कर,
ख़ैर-ओ-बरकत भी साथ मेरे घर आती है !

क्यूँ गुमाँ करता है इन महंगे लिबासों पर,
लाश के हिस्से तो बस एक सफ़ेद चादर आती है !

रोज़ तफ़सील से एक मौत मैं मर जाता हूँ,
ज़िन्दगी जब भी आती हैमुख़्तसर आती है !

राहतें बैरंग भी नहीं आती मुझको,
फ़ुर्क़तें मेरा नाम पता पूछकर आती हैं !

मेरे हालात से परख ले तू मेरी हस्ती,
मुश्किलें भी क़द-ओ-क़ामत देखकर आती है !

बिछड़ के मर जाने का डर तो उसको भी था,
तोहमत-ए-इश्क़ तो बस मेरे ही सर आती है !

उस क़ैदी की मसर्रत तुम क्या जानो,
बाद मुद्दत जब रिहाई की खबर आती है !

ज़िन्दगी देने में जनाबदारी तू करता क्यूँ है,
या ख़ुदा, मौत तो सबको बराबर आती है !

मुझको बहला न सकेगा तू दलीलों से,
तेरी हक़ीकत तेरे चेहरे पे नज़र आती है !

देखना, अँधेरा भी थक कर सो ही जाएगा,
'फ़राज़' हर शाम की एक सहर आती है !

||| फ़राज़ |||

हस्ती= Life, Existence.

महज़= Merely, Only.
ग़ुरूर= Pride, Proud.
ख़ैर-ओ-बरकत= Goodness/Wellness and Blessing/Benediction 
लिबास= Apparel, Dress.
तफ़सील= Detail.
मुख़्तसर= Brief.
राहत= Rest, Comfort, Ease.
बैरंग= Unpaid. Bearing (postage)
फ़ुर्क़त= Separation, Disunion, 
हालात= State, Condition, Circumstances.
क़द-ओ-क़ामत= Stature, Posture.
तोहमत-ए-इश्क़= Allegation of love.
मसर्रत= happiness.
मुद्दत= Period, Duration, After a long time.
जनाबदारी= Partiality.
दलील= Argument.
सहर= Morning.


शनिवार, 2 सितंबर 2017

रिहाई बेज़ुबान की !!!

मैं नहीं जानता दास्ताँ 
पिंजरे में क़ैद उस परिंदे की
मगर दिल है बाख़बर
उस बेज़ुबान के दर्द से !

एक काग़ज़ के टुकड़े के बदले
एक परिंदे को आज़ाद कर देना !

रिहाई बेज़ुबान की
इबादत है ख़ुदा की !!!

|||फ़राज़|||