अपनी हस्ती पे ग़ुरूर महज़ इतना सा है,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर आती है !
जब भी लौटता हूँ घर मैं नमाज़ पढ़कर,
ख़ैर-ओ-बरकत भी साथ मेरे घर आती है !
क्यूँ गुमाँ करता है इन महंगे लिबासों पर,
लाश के हिस्से तो बस एक सफ़ेद चादर आती है !
रोज़ तफ़सील से एक मौत मैं मर जाता हूँ,
ज़िन्दगी जब भी आती है, मुख़्तसर आती है !
राहतें बैरंग भी नहीं आती मुझको,
फ़ुर्क़तें मेरा नाम पता पूछकर आती हैं !
मेरे हालात से परख ले तू मेरी हस्ती,
मुश्किलें भी क़द-ओ-क़ामत देखकर आती है !
बिछड़ के मर जाने का डर तो उसको भी था,
तोहमत-ए-इश्क़ तो बस मेरे ही सर आती है !
उस क़ैदी की मसर्रत तुम क्या जानो,
बाद मुद्दत जब रिहाई की खबर आती है !
ज़िन्दगी देने में जनाबदारी तू करता क्यूँ है,
या ख़ुदा, मौत तो सबको बराबर आती है !
मुझको बहला न सकेगा तू दलीलों से,
तेरी हक़ीकत तेरे चेहरे पे नज़र आती है !
देखना, अँधेरा भी थक कर सो ही जाएगा,
'फ़राज़' हर शाम की एक सहर आती है !
||| फ़राज़ |||
हस्ती= Life, Existence.
महज़= Merely, Only.
ग़ुरूर= Pride, Proud.
ख़ैर-ओ-बरकत= Goodness/Wellness and Blessing/Benediction
लिबास= Apparel, Dress.
तफ़सील= Detail.
मुख़्तसर= Brief.
राहत= Rest, Comfort, Ease.
बैरंग= Unpaid. Bearing (postage)
फ़ुर्क़त= Separation, Disunion,
हालात= State, Condition, Circumstances.
क़द-ओ-क़ामत= Stature, Posture.
तोहमत-ए-इश्क़= Allegation of love.
मसर्रत= happiness.
मुद्दत= Period, Duration, After a long time.
जनाबदारी= Partiality.
दलील= Argument.
सहर= Morning.
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