बुधवार, 13 दिसंबर 2017

चराग़-ए-हसरत !!!

बस एक नज़र प्यार की काफ़ी थी हमें,
ज़्यादा तो मेरे दिल का किराया न था !
अजब ख़सारे में है इस बार दिल-ए-मुफ़लिस,
उसको खोया है जिसको कभी पाया न था !

ज़ख़्म काँटों का होता तो दवा ढूंढ लेते,
ज़ख़्म फूलों से कभी हमने खाया न था !
आज दर्द दिया है उसने तो गवारा कर ले,
ऐसा तो नहीं की उसने कभी हंसाया न था !

आँखों में क्यूँ चुभ रहा है यादों का धुआं,
उसका कोई भी ख़त तो मैंने जलाया न था !
शायद भरम बाक़ी है दिल को तेरी यादों का,
चराग़-ए-हसरत अभी हमने बुझाया न था !

झूठ ही सही मगर हाल तो पूछ लेता था,
तू ग़ैर तो था मगर इतना पराया न था!
साथ तो चलता था वो हर क़दम 'फ़राज़',
ये और बात है कि वो मेरा साया न था !

|||फ़राज़|||

अजब= Strange
ख़सारा= Loss.
दिल-ए-मुफ़लिस= Poor Heart.
गवारा= Bear, Tolerate.
भरम= Reputation, Trust, Secret.
चराग़-ए-हसरत= Lamp of desires.
ग़ैर= Stranger, Unknown.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें