मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

जिस्म का साया !!!

जिसकी हसरत का चराग़ मैंने जलाया था,
उसने ही मेरा पता हवाओं को बताया था !

तूने जो देखा वो तो बस तेरा ही चेहरा था,
मैंने तो सिर्फ़ आईना तुझको दिखाया था !

प्यार के साथ हर झगड़ा भी ख़त्म हो गया,
और उसको लगा कि उसने मुझे हराया था !

मेरे नाम की सरग़ोशियाँ बाक़ी हैं तेरी महफ़िल में,
बदनामियाँ ही सही, इश्क़ में कुछ तो कमाया था !

शायद तुझको भी मेरी कोई बात चुभती हो,
मुझे फूलों ने ठुकराया, काँटों ने सहलाया था !

राहतें भी तो अब मुझे तिश्नगी से मिलती हैं,
मुझे बारिश ने तरसाया, बंजर ने अपनाया था !

आज मिला वो किसी और की परछाईं बनकर,
कल तलक जो 'फ़राज़' के जिस्म का साया था !

|||फ़राज़|||

हसरत= Desire
सरग़ोशियाँ= whisper, gossip
महफ़िल = Assembly, Party, Gathering.
बदनामियाँ= Notorities.
तिश्नगी= Thirst, Longing.



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें