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सोमवार, 13 मई 2019

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

क़द-ओ-क़ामत !!!

अपनी हस्ती पे ग़ुरूर महज़ इतना सा है,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर आती है !

जब भी लौटता हूँ घर मैं नमाज़ पढ़कर,
ख़ैर-ओ-बरकत भी साथ मेरे घर आती है !

क्यूँ गुमाँ करता है इन महंगे लिबासों पर,
लाश के हिस्से तो बस एक सफ़ेद चादर आती है !

रोज़ तफ़सील से एक मौत मैं मर जाता हूँ,
ज़िन्दगी जब भी आती हैमुख़्तसर आती है !

राहतें बैरंग भी नहीं आती मुझको,
फ़ुर्क़तें मेरा नाम पता पूछकर आती हैं !

मेरे हालात से परख ले तू मेरी हस्ती,
मुश्किलें भी क़द-ओ-क़ामत देखकर आती है !

बिछड़ के मर जाने का डर तो उसको भी था,
तोहमत-ए-इश्क़ तो बस मेरे ही सर आती है !

उस क़ैदी की मसर्रत तुम क्या जानो,
बाद मुद्दत जब रिहाई की खबर आती है !

ज़िन्दगी देने में जनाबदारी तू करता क्यूँ है,
या ख़ुदा, मौत तो सबको बराबर आती है !

मुझको बहला न सकेगा तू दलीलों से,
तेरी हक़ीकत तेरे चेहरे पे नज़र आती है !

देखना, अँधेरा भी थक कर सो ही जाएगा,
'फ़राज़' हर शाम की एक सहर आती है !

||| फ़राज़ |||

हस्ती= Life, Existence.

महज़= Merely, Only.
ग़ुरूर= Pride, Proud.
ख़ैर-ओ-बरकत= Goodness/Wellness and Blessing/Benediction 
लिबास= Apparel, Dress.
तफ़सील= Detail.
मुख़्तसर= Brief.
राहत= Rest, Comfort, Ease.
बैरंग= Unpaid. Bearing (postage)
फ़ुर्क़त= Separation, Disunion, 
हालात= State, Condition, Circumstances.
क़द-ओ-क़ामत= Stature, Posture.
तोहमत-ए-इश्क़= Allegation of love.
मसर्रत= happiness.
मुद्दत= Period, Duration, After a long time.
जनाबदारी= Partiality.
दलील= Argument.
सहर= Morning.


शनिवार, 19 नवंबर 2016

महरूमियत


आज फ़िर यूँही गुज़रा मैं जो बीते कल से,
रूह को बाक़ी तेरी महरूमियत आज भी है !
काश यूँ भी होता की साथ तू भी होता,
एक दबी-दबी सी हसरत आज भी है !

तेरे ख़याल पर कुछ ठहर सा जाता हूँ,
एक पहले सी मेरी फ़ितरत आज भी है !
रात, चाँद, सितारे और तन्हाई भी है,
और साथ मेरे फ़ुरक़त आज भी है !

कुछ देर चाँद दिखा और फिर छुप गया,
तुझ जैसी इसकी आदत आज भी है !
बस रात और ख़ामोशियाँ ही रहे फ़िर बाक़ी,
बस इतनी ही मेरी सोहबत आज भी है

तू ख़्वाब में आया, फ़िर न नींद आई,
हर रात की सी हालत आज भी है !
चल भूल ही जाते हैं ‘फ़राज़’ उसको
बाक़ी बस यही सूरत आज भी है !