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बुधवार, 20 सितंबर 2017

नाज़-ओ-अंदाज़!!!

एक चाँद ने क़दम जो ज़मीं पर उतारे,
आसमान से शिक़ायत करने लगे सितारे !

मुसव्विर सा हूँ मैं डूबा दीदार में तेरे,
जलने लगे हैं तुझसे क़ुदरत के नज़ारे !

अंगड़ाई जो तूने ली तो मन लहराया सा है,
चाक जिगर होता है जो तू ज़ुल्फ़ संवारे !

नाज़-ओ-अंदाज़ जुदा तेरी हर अदा में हैं,
आजिज़ी भी यूँ सुनता है जैसे अहसान उतारे !

देखता भी यूँ है जैसे देखता ही न हो,
घायल से कर गए हैं मुझको तेरे इशारे !

तूफ़ान से लड़ने का शौक़ था तुझे 'फ़राज़',
बारहा घर बना लिया है समंदर के किनारे !

|||फ़राज़|||

मुसव्विर= Painter, Sculpturer, Photographer
क़ुदरत= Nature, The Universe.
चाक= Stil, Ton, Cut.
नाज़= Pride, Grace
अंदाज़= Mannerism.
आजिज़ी= Helplessness, Humility, Inability, Submissiveness.

बुधवार, 12 जुलाई 2017

एक सवाल !!!

मेरी लकीरों में तो तेरा नाम लिखा था कल तक,
ख़ंजर से आज लकीरें आख़िर ये मिटाता कौन है !

कोई रिश्ता नहीं बाक़ी फ़िर भी बाक़ी कुछ तो है,
ख़्वाब से रातों में आख़िर ये जगाता कौन है !

ये वादा तो तेरा ही था की बिछड़े तो मर जाएँगे,
आज उन वादों से आख़िर ये मुकर जाता कौन है !

अब तू ही बता कि क्यूँ न तुझको दुश्मन समझूँ,
बीच भंवर कश्तियों को छोड़ के जाता कौन है

मुझको यकीं है तेरे लौट के न आने का,
ग़लतियां करके भला दोहराता कौन है !

तू तो चाँद हुआ करता था मेरे आँगन का,
सितारे सफ़र के अब मुझे दिखलाता कौन है !

रिश्ता जिस्म का ही रहा होगा शायद,
रूहों को भला जुदा कर पाता कौन है !

वस्ल भी देख लिया फ़िराक़ भी देख लिया,
नज़्म बग़ैर तजुर्बा लिए लिख पाता कौन है !

||| फ़राज़ |||

वस्ल= Meeting, Union.
फिराक़= Separation, Absence, Departing.

रविवार, 7 मई 2017

बचपन !!!

भरा है बटुआ पर मुफ़्लिसी नहीं जाती,
फोड़ कर गुल्लक अमीर हो जाया करते थे !
जाने अब क्यूँ अजनबी से लगते हैं सितारे,
गिन-गिन कर जिनको हम रात बिताया करते थे !

एक पेंसिल के दो टुकड़े कर देते थे,
मासूम दोस्ती कुछ यूँ निभाया करते थे !
जाने कब चुक गईं वो टॉफियाँ, जो तुम्हारे साथ,
दांत से काट कर आधी-आधी खाया करते थे !

इन दानिशवरों से वो नादान थे बेहतर,
रूठने पर जो हमको मनाया करते थे !
तरक्की की रफ़्तार में सूख गई वो बहती नदी,
स्कूल से भाग कर जिसमें नहाया करते थे !

सुनते हैं अब वहां कोई पेड़ नहीं बचा,
आम जिस बाग़ से हम चुराया करते थे !
मेरे हाथों का सहारा अब वो ढूढ़ते हैं,
जिनकी ऊँगली पकड़कर हम स्कूल जाया करते !

||| फ़राज़ |||


बटुआ= Wallet
मुफ़्लिसी= Poverty
गुल्लक= Piggy bank
अमीर= Rich
दानिशवर= Scholar, Intellectual.
नादान= Innocent
तरक्की= Development
बाग़= Garden

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फ़िक्र !!!

यूँ तो मेरे भी इर्द-गिर्द
हमदर्द-ओ-ग़मख़्वार हैं
तू हाल मेरा पूछ ले,
ये जहाँ मुझसे जल जाए !

आरज़ू के दो दिनों में
हमने गुज़ारी उम्र है
हसरतों की रात ये,
यूँ ही कहीं न ढल जाए !

चल सितारों में ही अब
कर लें कहीं हम आशियाँ,
इससे पहले कि ज़माना
फ़िर चाल कोई चल जाए !

पहलू में आ गए हो तो
ख़ामोशियों को तोड़ दो
शर्म-ओ-हया में फ़िर कहीं,
ये रात भी न ढल जाए !

तेरी वफ़ाओं पर यकीं,
यूँ तो बहुत ऐ यार है,
डर है मुझे कि दिल कहीं
तेरा न फ़िर संभल जाए !

||| फ़राज़ |||

शनिवार, 19 नवंबर 2016

महरूमियत


आज फ़िर यूँही गुज़रा मैं जो बीते कल से,
रूह को बाक़ी तेरी महरूमियत आज भी है !
काश यूँ भी होता की साथ तू भी होता,
एक दबी-दबी सी हसरत आज भी है !

तेरे ख़याल पर कुछ ठहर सा जाता हूँ,
एक पहले सी मेरी फ़ितरत आज भी है !
रात, चाँद, सितारे और तन्हाई भी है,
और साथ मेरे फ़ुरक़त आज भी है !

कुछ देर चाँद दिखा और फिर छुप गया,
तुझ जैसी इसकी आदत आज भी है !
बस रात और ख़ामोशियाँ ही रहे फ़िर बाक़ी,
बस इतनी ही मेरी सोहबत आज भी है

तू ख़्वाब में आया, फ़िर न नींद आई,
हर रात की सी हालत आज भी है !
चल भूल ही जाते हैं ‘फ़राज़’ उसको
बाक़ी बस यही सूरत आज भी है !