मेरी लकीरों में तो तेरा नाम लिखा था कल तक,
ख़ंजर से आज लकीरें आख़िर ये मिटाता कौन है !
कोई रिश्ता नहीं बाक़ी फ़िर भी बाक़ी कुछ तो है,
ख़्वाब से रातों में आख़िर ये जगाता कौन है !
ये वादा तो तेरा ही था की बिछड़े तो मर जाएँगे,
आज उन वादों से आख़िर ये मुकर जाता कौन है !
अब तू ही बता कि क्यूँ
न तुझको दुश्मन समझूँ,
बीच भंवर कश्तियों को छोड़ के जाता कौन है
मुझको यकीं है तेरे लौट के न आने का,
ग़लतियां करके भला दोहराता कौन है !
तू
तो चाँद हुआ करता था मेरे आँगन का,
सितारे सफ़र के अब मुझे दिखलाता कौन है !
रिश्ता जिस्म का ही रहा होगा शायद,
रूहों को भला जुदा कर पाता कौन है !
वस्ल भी देख लिया फ़िराक़ भी देख लिया,
नज़्म बग़ैर तजुर्बा लिए लिख पाता कौन है !
||| फ़राज़ |||
वस्ल= Meeting, Union.
फिराक़= Separation, Absence, Departing.
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