बुधवार, 26 जुलाई 2017

पुरवाई !!!

लगता है छू कर आई है मेरे घर को,
बड़ी हमदर्द सी मुझे आज हवा लगती है !

छू के यूँ गुज़री के हर ज़ख्म भर गया,
पुरवाई में शामिल माँ की दुआ लगती है !

कल ख़्वाब में घर था और घर में मैं,
ख़ुशग़वार मुझे आज की सुबह लगती है !

फ़िज़ा में बहती है वहां ख़ुशबुएँ रिश्तों की,
रूह को तस्कीन सी घर की हवा लगती है !

जिस ज़मीं पे बने थे मेरे पहले क़दम,
वो दर-ओ-दीवार मुझे रहनुमा सी लगती है !

झांक कर देखा तेरी पलकों के दरवाज़ों में,
तेरी दुनिया मेरे ख़्वाबों का मकां लगती है !

दिन ढलने का बहाना करके चली जाती है,
शब्-ए-तन्हाई, तू भी महबूबा सी लगती है !

मेरी तरबियत, मेरी तहज़ीब का आईना है,
बहुत मीठी सी मुझे उर्दू जुबां लगती है !

||| फ़राज़ |||

ख़ुशग़वार=Pleasent, Congenial.
फ़िज़ा= Breeze
तस्कीन= Comfort, Soothing.
शब्-ए-तन्हाई=Night of Loneliness.
तरबियत= Education, Training,
तहज़ीब= Culture.



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