लगता है छू कर आई है मेरे घर को,
बड़ी हमदर्द सी मुझे आज हवा लगती है !
छू के यूँ गुज़री के हर ज़ख्म भर गया,
पुरवाई में शामिल माँ की दुआ लगती है !
कल ख़्वाब में घर था और घर में मैं,
ख़ुशग़वार मुझे आज की सुबह लगती है !
फ़िज़ा में बहती है वहां ख़ुशबुएँ रिश्तों की,
रूह को तस्कीन सी घर की हवा लगती है !
जिस ज़मीं पे बने थे मेरे पहले क़दम,
वो दर-ओ-दीवार मुझे रहनुमा सी लगती है !
झांक कर देखा तेरी पलकों के दरवाज़ों में,
तेरी दुनिया मेरे ख़्वाबों का मकां लगती है !
दिन ढलने का बहाना करके चली जाती है,
शब्-ए-तन्हाई, तू भी महबूबा सी लगती है !
मेरी तरबियत, मेरी तहज़ीब का आईना है,
बहुत मीठी सी मुझे उर्दू जुबां लगती है !
||| फ़राज़ |||
ख़ुशग़वार=Pleasent, Congenial.
फ़िज़ा= Breeze
तस्कीन= Comfort, Soothing.
शब्-ए-तन्हाई=Night of Loneliness.
तरबियत= Education, Training,
तहज़ीब= Culture.
ख़ुशग़वार=Pleasent, Congenial.
फ़िज़ा= Breeze
तस्कीन= Comfort, Soothing.
शब्-ए-तन्हाई=Night of Loneliness.
तरबियत= Education, Training,
तहज़ीब= Culture.