हक़ीकत-ए-हस्ती अपनी
मैं तुझसे बयां करता हूँ,
हार जाता हूँ जब ख़ुद से
तो गुनाह करता हूँ मैं !
तू भी पाक दामन नहीं
ऐब तुझमे भी हैं बेशक़,
बारहा तेरी पर्देदारियों का
एहतराम करता हूँ मैं !
मेरी लकीरों में थी आवारगी
तो तुझे इल्ज़ाम क्या दूँ,
खेल लकीरों का ही था,
चल एतराफ़ करता हूँ मैं !
पूज कर उस पत्थर को
मैंने ही ख़ुदा कर डाला,
बरबादियों का कुछ यूँ
इन्तिज़ाम करता हूँ मैं !
शायद तू फ़िर से कभी
सब छोड़ के आ जाये,
शिक़ायतें, हसरतें, किस्से,
सब एहतिमाम रखता हूँ !
रेत के साथ मिट गए
तेरे क़दमों के सारे निशां,
राह के पत्थरों से अब भी
दुआ सलाम करता हूँ मैं !!!
|||फ़राज़|||
मैं तुझसे बयां करता हूँ,
हार जाता हूँ जब ख़ुद से
तो गुनाह करता हूँ मैं !
तू भी पाक दामन नहीं
ऐब तुझमे भी हैं बेशक़,
बारहा तेरी पर्देदारियों का
एहतराम करता हूँ मैं !
मेरी लकीरों में थी आवारगी
तो तुझे इल्ज़ाम क्या दूँ,
खेल लकीरों का ही था,
चल एतराफ़ करता हूँ मैं !
पूज कर उस पत्थर को
मैंने ही ख़ुदा कर डाला,
बरबादियों का कुछ यूँ
इन्तिज़ाम करता हूँ मैं !
शायद तू फ़िर से कभी
सब छोड़ के आ जाये,
शिक़ायतें, हसरतें, किस्से,
सब एहतिमाम रखता हूँ !
रेत के साथ मिट गए
तेरे क़दमों के सारे निशां,
राह के पत्थरों से अब भी
दुआ सलाम करता हूँ मैं !!!
|||फ़राज़|||
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