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रविवार, 16 जुलाई 2017

नादानियाँ !!!

साफ़ दिखती हैं तेरी हक़ीकत की सारी गिरहें,
आइनों से अपनी हस्ती छुपाया न कर !

ख़बरनवीस फिरते हैं हर कूचा-ओ-बाज़ार में,
राज़ दिल के तू सबसे बताया न कर !

अब तो कोई पत्थर भी नहीं उछालता तुझपर,
दिल-ए-नादाँ अब उसकी गली में जाया न कर !

तेरी नादानियों से वो हिफ़्ज़ हो गया तुझको,
वो और याद आएगाउसे भुलाया न कर !

लोग मरहम ही नहीं नमक भी लिए बैठे हैं,
ज़िक्र कभी उसका तू होंठों पे लाया न कर !

किसी और का हक़ है उसकी हर सांस पर,
कसम उसके नाम की अब तू खाया न कर !

कौन सुनता है ख़ामोशियाँ इस शोरशराबे में,
सब्र तू भी 'फ़राज़' इस क़दर आज़माया न कर !

||| फ़राज़ |||

गिरहें= Knot, joints, knuckles. 

ख़बरनवीस= Journalists. 
कूचा-ओ-बाज़ार= Narrow street and Market.
दिल-ए-नादाँ= Innocent heart. Shortsighted, Improvident.
हिफ्ज़= Rote, Memory
शोरशराबे= Noises.

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फ़िक्र !!!

यूँ तो मेरे भी इर्द-गिर्द
हमदर्द-ओ-ग़मख़्वार हैं
तू हाल मेरा पूछ ले,
ये जहाँ मुझसे जल जाए !

आरज़ू के दो दिनों में
हमने गुज़ारी उम्र है
हसरतों की रात ये,
यूँ ही कहीं न ढल जाए !

चल सितारों में ही अब
कर लें कहीं हम आशियाँ,
इससे पहले कि ज़माना
फ़िर चाल कोई चल जाए !

पहलू में आ गए हो तो
ख़ामोशियों को तोड़ दो
शर्म-ओ-हया में फ़िर कहीं,
ये रात भी न ढल जाए !

तेरी वफ़ाओं पर यकीं,
यूँ तो बहुत ऐ यार है,
डर है मुझे कि दिल कहीं
तेरा न फ़िर संभल जाए !

||| फ़राज़ |||

शनिवार, 4 मार्च 2017

ख़यालों के धागे !!!

थाम कर मेरे ख़यालों की डोर
तू चला आता है
मेरे हर ख़याल में
और मेरे ही ख़यालों के धागों से
बुनता है तू ख़्वाब नए !

तुझको ही बोलती हैं
तुझको ही सुनती हैं
मेरी ख़ामोशियाँ !
करती हैं जिरह
मेरी ख़ामोशियों से
तेरी ख़ामोशियाँ !

साँसों से उलझी हैं
अब तलक
कुछ पहले सी साँसें
कुछ पहले सी ख़ुशबुएँ !

उस उम्र की रूह
क़ैद है अब तलक
मेरी रूह में
मेरे जिस्म में !

एक उम्र है गुज़री
दरमियाँ
तेरे आने से
तेरे जाने तक !

| फ़राज़ |