मंगलवार, 2 जनवरी 2018

दुआ !!!

'फ़राज़' अपने किसी ऐब को तू क़ज़ा कर दे,
साल नया आया है, तू भी कुछ नया कर दे !

ख़ुदारा तू हसरतें मेरी मुख़्तसर कर दे,
या फ़िर मेरी चादर को तू बड़ा कर दे !

अपनी ख़्वाहिश की ग़ुलामी करता हूँ मैं,
नफ़्स की क़ैद से तू मुझे रिहा कर दे !

मुझको चाहत नहीं फ़रिश्ता बनने की,
ख़ुदारा, मुझको तो बस तू इंसाँ कर दे !

सोचता हूँ कि शायद कोई शोरफ़ा न रहे,
गर ख़ुदा दीवारों को लब-कुशा कर दे !

बातिन का कोई इल्म तो नहीं है मुझको,
या मुझे ख़्वाब न दे, या ताबीरदां कर दे !

तेरे लहू की तासीर भी ज़माना देखेगा,
अपने हुनर को तू रगों में रवां कर दे !

कभी ग़ालिब ने लिखा, अब 'फ़राज़' लिखता है
इश्क़ इतना न कीजिये, जो निकम्मा कर दे !

||| फ़राज़ |||

क़ज़ा= Death.
ऐब= Defect, Vice, Imperfection.
हसरत= Desire.
मुख़्तसर= Brief, Concise.
ख़्वाहिश= Wish, Desire, Will.
ग़ुलामी= Slavery, Servitude,
नफ़्स= Soul, Spirit, Self.
फ़रिश्ता= Angel
इंसाँ= Human.
शोरफ़ा= Gentlemen, Noble.
लब-कुशा= Opened lip, One who can speak.
बातिन= Concealed, Covert, Unapparent.
इल्म= Knowledge
ताबीरदां= One who interprets the dream.
लहू= Blood.
तासीर= Effect, Influence, Impression.
रग= Vein, Artery, Nerve.
रवां= Moving, Active, Life.

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