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सोमवार, 26 नवंबर 2018

क़ीमत

क्यूँ कहता है महंगाई है,
अब भी सस्ती अच्छाई है !

अब भी सस्ता है मुस्काना,
अब भी सस्ती तो भलाई है !

हो अह्ल-ए-नज़र, तुम क्या जानो
कितनी महँगी बीनाई है !

दुनिया की दौलत न माने,
कितनी महंगी सच्चाई है !

महसूस करो इसको छू कर,
अब भी सस्ती पुरवाई है !

सौ नाज़ उठा के हासिल है
कितनी महंगी अंगड़ाई है!

जिस भीड़ में न कोई अपना,
उससे बेहतर तन्हाई है !

हर रोज़ हूँ बिकता सस्ते हैं
कितनी महँगी ये कमाई है !

क़ानून की क़ीमत है सस्ती
महँगी 'अल्फ़ाज़' रिहाई है !

||| अल्फ़ाज़ |||

अह्ल-ए-नज़र= People Of Vision
बीनाई= Vision, Eye-Sight
नाज़= Pride, Grace, Tantrum
हासिल= Gain
बेहतर= Better

क़ानून= Law, Ordinance, Rule