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बुधवार, 7 जून 2017

इश्क़-ए-तिजारत !!!


हम फूल से ज़ख़्मी हो बैठे,
काँटों की शिक़ायत क्या करते !
हाकिम ही मेरा जब मुजरिम है,
हम अपनी वक़ालत क्या करते !

लुटना ही दिलों की क़िस्मत है,
हम दिल की हिफ़ाज़त क्या करते !
इल्ज़ाम तेरे सब हम पर हैं,
हम और सख़ावत क्या करते !

तू दर्द-ओ-सितम का सौदागर,
हम इश्क़-ए-तिजारत क्या करते !
तू ख़ुद की इबादत करता है,
हम तुझसे मोहब्बत क्या करते !

|||फ़राज़|||

हाकिम= Judge, Ruler, Master
मुजरिम= Sinner, Culprit, Offender
वक़ालत= Advocacy
सख़ावत= Generosity
इश्क़-ए-तिजारत= Trade/ Commerce of love

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

लोग !

क़ैद करते हैं परिंदों को पिंजरों में
आज़ादी-ए-वतन पर इतराते हैं लोग !

करते हैं फ़साद इबादतगाहों की ख़ातिर
इबादत में वक़्त कम ही बिताते हैं लोग !

अक्सर देते हैं हवाले मसरूफ़ियात के
अब लोगों के काम कहाँ आते हैं लोग !

करते हैं इश्तेहार लोगों की ख़ताओं का
अपने गिरेबां में झाँक कहाँ पाते है लोग !

सब कहाँ पाते हैं यहाँ आसमान नया
रास्ते औरों के ही अक्सर दोहराते हैं लोग !

करते हैं वक़ालत लोग इश्क़दारी की
भूल पाने का हुनर कहाँ बताते हैं लोग !

हर जिंदा बशर में ऐब ढूंढ लेने वाले
मय्यतों पर यहाँ सोज़ मनाते हैं लोग !

||| फ़राज़ |||