शब्-ए-तन्हाई थी, कि काटे नहीं कटती थी,
बस
इसी वास्ते मैं एक जाम ख़रीद लाया
हूँ !
जानता हूँ कि ये मरहम भी कामिल तो नहीं है,
कुछ
लम्हों का सही,
मैं
आराम ख़रीद लाया हूँ !
अब दोस्तों पे ख़र्च करूँ, या तसव्वुर-ए-यार पर,
दिन
भर की कमाई से मैं ये शाम ख़रीद लाया हूँ !
ये ज़माना एक दिन तुझको भी दीवाना कहेगा,
मैं
भी इश्क़ करके एक इल्ज़ाम ख़रीद लाया
हूँ !
सिर्फ़ दिल-ए-नादाँ ही उसकी उम्मीद लगाये बैठा है,
यूँ
तो मैं अपनी मौत का हर सामान ख़रीद लाया हूँ !
बता कैसे हरायेगा अब तू मुझे इंसाफ़ के खेल में,
तू वकील ही तो लाया
है,
मैं हुक्काम ख़रीद लाया
हूँ !
तुझसे ही सीखा है मैंने सियासत का सबक़,
मैं
भी ईमान बेचकर आवाम ख़रीद लाया
हूँ !
आज फ़िर मेरे ज़मीर को कोई ख़रीद न सका,
मैं
न बिक कर भी अपना दाम ख़रीद लाया हूँ !
वो रंगीन गुब्बारे इतने महंगे भी न लगे 'फ़राज़',
मैं किफ़ायत से बच्चों की
मुस्कान ख़रीद लाया हूँ !
||| फ़राज़ |||
शब्-ए-तन्हाई= Night of loneliness.
वास्ते=
For, for the cake
of,
जाम= Glass of wine.
मरहम= Ointment.
कामिल=
Perfect, Complete.
तसव्वुर-ए-यार=
Thinking about the
beloved.
इल्ज़ाम=
Blame, Accusation
दिल-ए-नादाँ=
Innocent heart.
इंसाफ़=
Justice
वकील= Lawyer, Advocate
हुक्काम=
Judges, Magistrate,
Authorities.
सियासत=
Politics,
Administration.
ईमान= Conscience, Faith.
आवाम= Public, Common People.
ज़मीर= Conscience, Heart,
Pronoun.
किफ़ायत=
Economy, careful management of money.