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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

चराग़ाँ !!!

सर-ए-शाम मैं बैठा हूँ चराग़ाँ करके, 
चले भी आओ कि कहीं रात न ढल जाये !

अपनी हथेली की हिना में मेरा नाम लिख लो,
नज़र का क्या है, कौन जाने कब बदल जाये !

अपनी धड़कनों पर इख़्तियार मुझको दे दो,
इससे पहले कि ये ज़माना कोई चाल चल जाये !

ये तन्हाइयां डराती हैं, कुछ 
तो जतन करो,
अब चले भी आओ कि हर बला टल जाये !

लम्हे जो मुट्ठी में हैं, आओ इन्हें मिलके जी लें,
रेत की तरह हाथ से लम्हें न फिसल जाये !

तसव्वुर-ए-यार को अभी ग़ज़ल कर दे 'फ़राज़'
इससे पहले कि दिल की कैफ़ियत बदल जाये !


                                                     |||फ़राज़|||


सर-ए-शाम= About evening time, evening.

चराग़ाँ= Display of lamps, Lighting.
हिना= Henna, Myrtle.
इख़्तियार= Authority, Controle, Influence.
जतन= Effort.
तसव्वुर-ए-यार= Thought/ Imagination of Beloved/Friend.
कैफ़ियत= Circumstances, Condition, Situation.

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...

क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...

एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...

ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...

वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...