फ़ुर्सत की अलमारी के
एक ख़ामोश से कोने में
ढूंढ रहे थे हम
न जाने यादें किसकी,
अहसासों पर से
लम्हों की धूल हटाई
तो शाया हुए ऐसे भी वर्क़
जहाँ लम्हें महफूज़ थे
एक काग़ज़ में लिपटे !
कुछ बोलते से लफ्ज़ मिले
जिनमें लिखावट मेरी न थी
तुमने कुछ लिखा था
मेरे लिए,
कुछ नीले रंग से
तो कुछ ख़ास अहसास
लाल रंग से !
स्याहियां उम्रदराज़ हो गयीं
तेरे धड़कते अहसासों से,
लोगों के बदल जाने से
यादें नहीं बदला करतीं !
एक फूल मिला
मेरी तरह मुरझाया सा
अकेलेपन से !
कि अब ख़ुशबू न थी उसमें,
फ़िर भी यूँ महसूस हुआ
जैसे हवा का कोई झौंका
मुझतक आया है
तुमको छू कर !
और मुझमे बस गया हो
हमेशा के लिए
तुम्हारी तरह !
एक गीली सी शाम मिली
और वो पहली बारिश
जब साथ भीगे थे,
हम और तुम !
मन का वो हिस्सा
आज भी गीला है,
और मेरी पलकों को
अक्सर गीला कर जाता है,
क़तरा-क़तरा बरसता है आँखों से
और मेरे ही लिखे अल्फ़ाज़ों को
धुंधला कर जाता है !!!
||| फ़राज़ |||