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रविवार, 28 अक्टूबर 2018

हसरत

पाँवों को फैलाने की फ़ितरत का क्या करूँ,
चादर का नहीं दोषमैं हसरत का क्या करूँ !

ऐ काश भुला पाता तुम्हे मैं भी मुकम्मल,
शिकवे तो भूल जाऊँमोहब्बत का क्या करूँ !

तुमको है यही ज़िद कि भुला दूँ तुम्हें मैं भी,
ख़्वाहिश तो छोड़ दूँ मैं आदत का क्या करूँ !

ज़िद छोड़ दूँ तेरी मगर मसअला है कुछ अलग,
हसरत तो दबा लूँमैं ज़रुरत का क्या करूँ !

अच्छी तरह पहचानता हूँ मैं तेरे मुखौटे,
सीरत तेरी बुरी है तो सूरत का क्या करूँ !

हर इल्ज़ाम गवारा था तेरे इश्क़ में हमको,
तू ही नहीं तो मैं तेरी तोहमत का क्या करूँ !

रुक जायेगा तूने अगर सोचा कभी ऐसा,
मेहनत में न कमी थी मैं क़िस्मत का क्या करूँ !

'अल्फ़ाज़मैं क्या पाउँगा हो कर के जन्नती,
जब यार हों  दोज़ख़ में तो जन्नत का क्या करूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ितरत= Nature
दोष= Fault, Sin
हसरत= Unfulfilled Desire
मुकम्मल= Complete
शिक़वा= Complaint, Reproach
ख़्वाहिश= Wish, Inclination
मसअला= Problem, Matter,
मुखौटे= Mask
सीरत= Quality, Disposition, Character
इल्ज़ाम= Accusation, Charge, Blame
गवारा= Bearable, Tolerable
तोहमत= Allegation, Accuse
जन्नतीDweller In Paradise
दोज़ख़= Hell