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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

बेघर !!!

एक उम्र से भटकता हूँ
मैं ख़ानाबदोशियों में,
एक ज़माने से मैं
बेघर सा रहता हूँ !

कभी दिल दुख जाये 
तो ख़ुद ही बहला लेता हूँ !
अब फ़िक्रें सोने नहीं देतीं
सुबह जल्दी उठ जाता हूँ ! 

ख़ुद ही संवार लेता हूँ
माथे से फ़िक्रों की सिलवटें
कपड़ों को अब ख़ुद ही
खूँटी पर टांग देता हूँ !

अहमियत अपने पैसों की,
कीमत रिश्तों की भी जानता हूँ !
मिल्लतदारियों, दुनियादारियों का
हिसाब अब मैं ख़ुद ही रखता हूँ !

आईने में अक्सर देखता हूँ
मेरे चेहरे सा एक चेहरा,
आइना बताता है अब
बदला-बदला सा दिखता हूँ !

चादर ख़ुद ही ओढ़ लेता हूँ
अब मैं सोने से पहले !
बारिशों में भी अब अक्सर
मैं कम ही भीगता हूँ !

एक एक्स्ट्रा चम्मच खाना
ख़ुद ही निकाल लेता हूँ !
दिल न भी चाहे तो भी
मन मार के खा लेता हूँ !

अपनी भी ज़िम्मेदारियां
कम नहीं होती हैं 'फ़राज़',
अपने घर से बहुत दूर
मैं बरसों से रहता हूँ !

||| फ़राज़ |||