शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अशआर की हाज़िरी !!!

मेरी हस्ती को दरकार नहीं शीशों की,
रेज़ा-रेज़ा होकर मुझे शीशागरी आई है !

है ग़रज़ तो ले ले  तू मेरी ठोकरों से सबक़,
जा-ब-जा भटका हूँ तो मुझे रहबरी आई है !

बस यही पल हैं हक़ीकत, तू जी भर जी ले,
क्या ख़बर कौन सी सांस आखरी आई है !

फ़ुरसतें, आवारगी, और सब शौक़-ओ-जूनून,
आदतों के सौदे में हाथ ये नौकरी आई है !

चल के काँटों पे है मैंने हँसना सीखा,
हो के मिसमार तजुर्बों से मसख़री आई है !

तू क्यूँ हैरान होता है मेरी बेनियाज़ी पर,
तेरी बेरुख़ी से ही हमें ये ख़ुदसरी आई है !

तेरी सोहबत हुई तो इश्क़ को जाना हमने,
तेरी फ़ुरक़तों में हासिल ये शायरी आई है !

तू भी फ़राज़ के अल्फाज़ से हानत ले ले,
आज फ़िर मुझपर अशआर की हाज़िरी आई है !

|||
फ़राज़|||

दरकार= Need, Necessity.
रेज़ा-रेज़ा= Shattered.
शीशागरी= Glass making.
ग़रज़= Intention, Purpose, Object. 
जा-ब-जा= Everywhere
रहबरी= Guidance.
फ़ुरसत= Leisure.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
शौक़= Ardour, Desires.
जूनून= Frenzy, Madness.
मिसमार- Demolished, Razed, Ruined.
मसख़री= Comedy, Funnyness.
बेनियाज़ी= Unconcern, Not being in any need.
बेरुख़ी= Ignorance, Indifference.
ख़ुदसरी= Obstinate, Stubbornness.
सोहबत= Association, Company.
फ़ुरक़त= Absences, Separation.
अल्फाज़= Words.
ज़हानत= Intelligence.
अशआर= Couplets.
हाज़िरी= Presence, Attendance.



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें