बुधवार, 6 सितंबर 2017

दिल के फ़रेब

रूबरू ख़ुद से मैं जिस पल हो गया,
एक पहेली सा था, मैं हल हो गया !

दिल के हर फ़रेब की किताबत की है,
कीमियागरी अब मेरा शग़ल हो गया !

जब भी तेरा नाम मेरी ज़ुबान पर आया,
मुख़ालिफ़ मेरे ये सारा शहर हो गया !

कुछ ठिकाने फ़िर कभी न आबाद हुए,
मेरे शहर से जब मैं शहर-बदर हो गया !

आना तो न था मुझे वापस तेरे दर पर ,
फ़क़त आदतन मुझसे ये अमल हो गया !

बिखरा सा था तू अब तलक ख़यालों में,
मैंने समेटा लिया तो तू ग़ज़ल हो गया !

|||फ़राज़|||

फ़रेब= Deception, Deceit.
किताबत= Correspondence.
कीमियागरी= Alchemy.
शग़ल= Hobby.
मुख़ालिफ़= Opposite, Enemy.
शहर-बदर= Outcasted, Exiled.
फ़क़त= merely, simply, only.
आदतन= Habitually.
अमल= Act.

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