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बुधवार, 6 सितंबर 2017

दिल के फ़रेब

रूबरू ख़ुद से मैं जिस पल हो गया,
एक पहेली सा था, मैं हल हो गया !

दिल के हर फ़रेब की किताबत की है,
कीमियागरी अब मेरा शग़ल हो गया !

जब भी तेरा नाम मेरी ज़ुबान पर आया,
मुख़ालिफ़ मेरे ये सारा शहर हो गया !

कुछ ठिकाने फ़िर कभी न आबाद हुए,
मेरे शहर से जब मैं शहर-बदर हो गया !

आना तो न था मुझे वापस तेरे दर पर ,
फ़क़त आदतन मुझसे ये अमल हो गया !

बिखरा सा था तू अब तलक ख़यालों में,
मैंने समेटा लिया तो तू ग़ज़ल हो गया !

|||फ़राज़|||

फ़रेब= Deception, Deceit.
किताबत= Correspondence.
कीमियागरी= Alchemy.
शग़ल= Hobby.
मुख़ालिफ़= Opposite, Enemy.
शहर-बदर= Outcasted, Exiled.
फ़क़त= merely, simply, only.
आदतन= Habitually.
अमल= Act.

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

सफ़र

ये और बात है कि सहते सितम रहे,
तेरे ज़िक्र पे बारहा ख़ामोश हम रहे !

दुनिया को ये शिकायत, क्यूँ फ़ासले हैं अब,
हमको तो बस गिला है, क्यूँ पास हम रहे !

ख़ामोश है मुंडेरें, सूनी है एक गली,
थे रूबरू जहाँ पर, हर शाम हम रहे !

उसको मेरी इबारत मशहूर कर गई
जिस नाम के सफ़र में बदनाम हम रहे !


फ़राज़