उसकी बातों में हैं
चमकते जुगनू,
और पलकों तले उजली
सी सहर रखता है !
उसकी गर्दिश है ज़हन
में हर लम्हा,
वो मेरी हर सोच में
घर रखता है !
उसकी आहटें है पुरवाइयाँ
तसल्ली की,
बनके सबा साँसों में
गुज़र रखता है !
है मेरे हवासों में
आवारगी उसकी,
वो मेरी सुध-बुध पे
असर रखता है !
देखता है तो चाक़
जिगर करता है,
दुश्मन-ए-जां
शमशीर-ए-नज़र रखता है !
देखता है तो
पुरसुकून सा करता है,
बोलता है तो तबियत
में सबर रखता है !
उसका दामन छू जाते
हैं मेरे आंसू,
मेरा हमदर्द मेरी खैर
ख़बर रखता है !
फ़राज़...
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