डूब ही जाती हैं कश्तियाँ काग़ज़ की
हर बार ख़तायें लहरें नहीं करतीं !
वो हुनरमंद था जो किनारे पर रहा
हम उतरे थे दरिया, मगर पार न हुए !
कुछ सितारे चमकते हैं अमावास रातों में
मेरे दिल में किसी रात अँधेरा नहीं होता !
रोज़ बावक़्त मिलने चले आते हैं
रुख़ फेरते नहीं सितारे इन्सान की तरह !
तमाम उम्र बेवजह भी नहीं गुज़री ‘फ़राज़’
एक दौर में कोई तेरा अपना भी था !
||| फ़राज़ |||
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