मंगलवार, 17 मई 2022

ढूँढते रह गए!

 

चैन खोया हुआ ढूँढते रह गए,

उम्र भर बचपना ढूँढते रह गए!

 

ज़िन्दगी हमको जी के चली भी गयी,

ज़िन्दगी का पता ढूँढते रह गए!

 

गाँव का घर हमे ढूँढता रह गया,

हम शहर में मकाँ ढूँढते रह गए!

 

दोस्तों ने कुछ ऐसे तजरबे दिए,

दुश्मनों में वफ़ा ढूँढते रह गए!

 

मौत आई तो हिकमत न कोई चली,

ज़िन्दगी भर दवा ढूँढते रह गए!

 

उस तरफ़ कोई आग बाक़ी न थी,

जिस तरफ़ हम धुआँ ढूँढते रह गए!

 

ठोकरों के सिवा और कुछ न मिला,

पत्थरों में खुदा ढूँढते रह गए!

 

तुमने इंसाँ को इन्सान समझा नहीं,

इसलिए तुम ख़ुदा ढूँढते रह गए!

 

मैं ख़यालों को ‘अल्फ़ाज़’ देता रहा,

लोग बस क़ाफ़िया ढूँढते रह गए!

||| अल्फ़ाज़|||


मकाँ =House, निवास

तजरबे = Experiences, अनुभव

वफ़ा = Fulfilment, Fidelity, Faithful

हिकमत = Cure, Medicare, उपचार

इंसाँ =  Human Being, Mankind, मनुष्य

क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya, तुकांत

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