शनिवार, 7 मई 2022

मसाइल

 

ज़िन्दगी के मसाइल खड़े हो गए,

सोचते हैं क्यूँ आख़िर बड़े हो गए!

 

ज़िम्मेदारी ने जेबें मेरी काट लीं,

ख़्वाब बटुए से मेरे बड़े हो गए!

 

देखना अबकी मैं भी बदल जाऊँगा,

साल कितने यही सोचते हो गए!

 

हैं बुरे जो महज़ जुर्म करते रहे,

जो सियासत में आए, भले हो गए!

 

दोस्ती जब किताबों से मैंने करी,

मेरे घर में कई आईने हो गए!

 

बात सच्ची जो हमने कही एक दिन,

जितने अच्छे थे, उतने बुरे हो गए!

 

मोड़ आया तो ‘अल्फ़ाज़’ ऐसा हुआ,

अपने-अपने सभी रास्ते हो गए!


मसाइल = मस’अले, विषय, समस्याएँ, Problems Subjects, Matters

बटुए = Wallet, Purse

महज़ = Merely, Only, केवल, मात्र

जुर्म = अपराध, Crime

सियासत = राजनीति, Politics

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