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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

तू नहीं आया !


आज दिल ने फ़िर एक शिक़ायत की,
आज फ़िर छोड़ जाने तू नहीं आया !

हमने लाख रौशन कीं तेरी गलियां,
मेरी एक याद जलाने तू नहीं आया !

लोग अक्सर सवाल पूछते हैं कैसे कैसे,
ज़माने को झुठलाने कभी तू नहीं आया !

क्या कोई चुभन तेरे भी दिल में है बाक़ी ,
महज़ अफ़सोस जताने तो तू नहीं आया !

मेरी ख़ुशियों की तिजारत करने वाले,
मेरे ज़ख्मों को मिटाने तू नहीं आया !

तू ज़ख्म देकर ही सुकून पाता है,
बारहा मरहम लगाने तू नहीं आया !

क्या हक़ीकत थी नाक़ाम रिश्ते की,
बातें हज़ार समझाने तू नहीं आया !

तुझको फ़िर भुला दिया, कि कोई चारा न था,
कोई कसम कोई रिवायत निभाने तू नहीं आया !

ज़िक्र-ए-फ़ितरत तू न कर मुझसे ‘फ़राज़’,
कभी मुक़म्मिल हो जाने तू नहीं आया !


फ़राज़....