आज दिल ने
फ़िर एक शिक़ायत की,
आज फ़िर छोड़
जाने तू नहीं आया !
हमने लाख
रौशन कीं तेरी गलियां,
मेरी एक याद
जलाने तू नहीं आया !
लोग अक्सर
सवाल पूछते हैं कैसे कैसे,
ज़माने को
झुठलाने कभी तू नहीं आया !
क्या कोई चुभन
तेरे भी दिल में है बाक़ी ,
महज़ अफ़सोस
जताने तो तू नहीं आया !
मेरी ख़ुशियों की तिजारत करने वाले,
मेरे ज़ख्मों
को मिटाने तू नहीं आया !
तू ज़ख्म
देकर ही सुकून पाता है,
बारहा मरहम
लगाने तू नहीं आया !
क्या हक़ीकत थी नाक़ाम रिश्ते की,
बातें हज़ार
समझाने तू नहीं आया !
तुझको फ़िर भुला
दिया, कि कोई चारा न था,
कोई कसम कोई
रिवायत निभाने तू नहीं आया !
ज़िक्र-ए-फ़ितरत
तू न कर मुझसे ‘फ़राज़’,
कभी
मुक़म्मिल हो जाने तू नहीं आया !
फ़राज़....