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मंगलवार, 6 अगस्त 2019

मेरी ग़ज़ल

जब तेरे ख़यालात पे मचली मेरी ग़ज़ल,
तब दश्त-ओ-बयाबान में भटकी मेरी ग़ज़ल !

सीने में फिर से कोई अरमान जला है,
काग़ज़ पे आतिशाना सुलगी मेरी ग़ज़ल !

दिल ने तेरी उम्मीद की शम्मा जलाई है,
जल कर के मोम जैसी पिघली मेरी ग़ज़ल !

जैसे कि चाँद पर से सरके कोई बादल,
रुख़ से नक़ाब जैसी सरकी मेरी ग़ज़ल !

सदियों का सफ़र कर के बस एक ही लम्हें में ,
मुट्ठी से रेत जैसी फिसली मेरी ग़ज़ल !

मैं आ गया समझ में शायद जनाब की,
वो फिर से पढ़ रहे हैं पिछली मेरी ग़ज़ल !

जिस मोड़ पे हमारी राहें जुदा हुईं थीं,
उस मोड़ पे हमेशा ठहरी मेरी ग़ज़ल !

अल्फ़ाज़ लिख रहा हैपढ़िये ज़रा संभल के,
कभी ज़हर तो कभी आग भी उगली मेरी ग़ज़ल !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़यालात = Thoughts, Imaginations, कल्पना
दश्त-ओ-बयाबान =  Desert And Wilderness
अरमान = Desire, Longing, Yearning, इच्छालालसा
आतिशाना = Fire-Like
शम्मा= Candle
रुख़ = Face, Appearance,on, Features
नक़ाब = Fem, Veil