जाने क्या असर है उसकी बातों में,
फिर ज़ख्म कोई भरने लगा हो जैसे !
वो इख़्तियार से हो रहा है दाख़िल,
ये जहाँ फिर सँवरने लगा हो जैसे !
एक उजाला सा मेरे घर में फैला है,
चाँद आँगन में उतरने लगा हो जैसे !
रंजिशें सब आज झूठी लगती हैं,
वक़्त फ़िर साजिशें करने लगा हो जैसे !
कुछ तो असर है दुआओं में मेरी,
वो मेरे नाम पे ठहरने लगा हो जैसे !
हर ख़याल मेरा महकने लगा है,
मेरी हर सांस में तू घुलने लगा हो जैसे !
रुख हवाओं ने बदला है फिर से,
मौसम आज निखरने लगा हो जैसे !