khana badosh लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
khana badosh लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 30 जून 2017

ख़ानाबदोशियां!!!

मुद्दतों तलक बेवजह दश्त-ओ-बियाबान भटके,
तेरे फ़ितूर से बचने को हम सारा जहान भटके !

यूँ तो हैं दिल को मेरे रंजिशें तुझसे हज़ार,
लेकिन पर्देदारियों की ख़ातिर बेज़ुबान भटके !

तेरे अक्स तलाशने चले थे तेरी मुंडेरों के साए में,
धूप छाँव के एक खेल में हम सुबह शाम भटके !

सोचा था मयक़शी से भर जायेंगे कुछ तो ज़ख्म,
लेकिन तेरी जलन में तिश्ना साक़ी-ओ-जाम भटके !

इतने भी नहीं तन्हा अभी ख़ानाबदोशियों से “फ़राज़”,
मेरी गर्दिशों में साथ मेरे भी कुछ महेरबान भटके !!!

|||फ़राज़|||

मुद्दत=for a long time
रंजिश=ill-will, hostility
तिश्ना=thirsty, insatiable, eagerly
साक़ी-ओ-जाम= bartender or cup-bearer and goblet.
दश्त-ओ-बियाबान= forest and deserts 
ख़ानाबदोशियाँ=nomadicity
गर्दिश= misfortune