बुधवार, 23 अगस्त 2017

मन!!!

मन किस माया में उलझा है,
ये कैसे ख़्वाब सजाता है,
है मन में इतना शोर सा क्यूँ,
जब कानों में फ़िर सन्नाटा है !

हर रात भटकता जोगी सा,
मन चाँद की हसरत रखता है,
हर रात मलामत करता है,
हर रात सफ़र दोहराता है !

मन बारिश भी, मन सहरा भी,
मन दलदल भी, मन दरिया भी,
मन झील सा ठहरा रहता है,
जब मौज उठे, बह जाता है !

जिस्म-ए-फ़ानी पर इतराकर,
मन ख़ुद ही ख़ुद को छलता है!
ख़ुद का पैग़म्बर बनकर,
मिट्टी का ख़ुदा पछताता है !

ख़ुद अपने दो हिस्से करके,
मन ख़ुद से राज़ छुपाता है,
मन ख़ुद ही बुत को गढ़ता है,
ख़ुद ही बुत से घबराता है !

मन क्यूँ कठपुतली जैसा है,
दुनियादारी के बंधन में,
मैं तोड़ता हूँ बंदिश जितनी,
मन उतना नाच नचाता है !!!

|||फ़राज़|||

माया= Illusion
जोगी= Gypsy, Nomad, Hermit, Ascetic.
सहरा= Desert, Wilderness
मलामत= Reproach, Rebuke.
मौज= Wave
जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal body.
पैग़म्बर= Prophet.
बुत= Idol
कठपुतली= Puppet
बंदिश= Closure, Stoppage.

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