सोमवार, 17 अप्रैल 2017

बेनक़ाब !!!

इन्सान कहाँ बदल पाते हैं सीरत अपनी,
बारहा अज़ीज़ होते हैं बेनक़ाब होने तक !!!

||| फ़राज़ |||

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें