इन्सान कहाँ बदल पाते हैं सीरत अपनी,
बारहा अज़ीज़ होते हैं बेनक़ाब होने तक !!!
||| फ़राज़ |||
बारहा अज़ीज़ होते हैं बेनक़ाब होने तक !!!
||| फ़राज़ |||
जिंदगी दो तरह के सवालों में है एक जीते हैं हम, एक ख़यालों में है! चलिए रूबरू कराते हैं अल्फ़ाज़ की अल्फ़ाज़ियत से l मैं वादा करता हूँ कि मेरी हर ग़ज़ल में आप मुझसे, और ख़ुद से भी मिलेंगे l