कोई आदाब-ए-वफ़ा न कभी निभाने आया,
तू जब आया तो फ़िर से छोड़ जाने आया !
जब तू आया तो एक नया ज़ख्म दिया,
कोई मरहम कभी तू न लगाने आया !
ये वक़्त-ए–आख़िर मेरा, और कंधे ग़ैरों के,
रस्म-ए-आख़िर भी न तू निभाने आया !
बहुत नाज़ था हमको वफ़ादारियों पर,
आज हम रूठे तो तू न मनाने आया !
||| फ़राज़ |||
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